आचार्य प्रदीप गोस्वामी जी ने बताया
हिंदू धर्म में माता प्रत्यंगिरा को देवी शक्ति का अत्यंत उग्र एवं शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। उन्हें अथर्वण भद्रकाली, नारसिंही तथा कुछ परंपराओं में निकुंभला के नाम से भी जाना जाता है। सिंहमुखी और मानव (नारी) शरीर वाले उनके स्वरूप को शक्ति, साहस और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार द्वारा हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भी उनका प्रचंड क्रोध शांत नहीं हुआ। कई शाक्त एवं तांत्रिक परंपराओं में वर्णित कथा के अनुसार, इसी समय माता प्रत्यंगिरा प्रकट हुईं और उन्होंने उस उग्र शक्ति को संतुलित किया।
माता प्रत्यंगिरा को नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर, अभिचार (काले जादू) तथा शत्रु बाधाओं से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। शाक्त और तांत्रिक परंपराओं में उनकी साधना विशेष महत्व रखती है और इसे योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करने की परंपरा मानी जाती है।
लोक मान्यताओं के अनुसार, रामायण काल में रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने युद्ध में विजय की कामना से निकुंभला देवी की आराधना की थी। कुछ परंपराएँ निकुंभला और माता प्रत्यंगिरा को एक ही शक्ति का स्वरूप मानती हैं, जबकि इस विषय में अलग-अलग मत भी प्रचलित हैं।
दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में माता प्रत्यंगिरा के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। भक्तों का विश्वास है कि माता प्रत्यंगिरा की कृपा से भय, बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है तथा जीवन में साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।